माँ पुकारे
या रचने सोबतच आपणास सांगावयास आवडेल की मी माझ्या रचना येथे सादर करत आहे . भाषेच्या मर्यादांना आपण दुर्लक्षित करावयास हवे . नाही का ?
सादर आहे माझी हिंदी कविता .
२३ मार्च ला शहीद दिवस असताना ही रचना झाली.. तीही हिंदीत झाली .
पेश है आपके सामने मेरी नवीनतम रचना
*माँ पुकारे*
माँ पुकारे
माँ पुकारे
आज तुमको
तुम सुन लेना
प्रिय हमारे
दूर भटक कर
निकल न जाओ
हाथ पकड कर
लौटो सारे
माँ पुकारे
आँखें के आगे
जब थे तुम
खेल निहारे
सांझ सकारे
ओझल होते
खेल बदलकर
कोई तुमको
गुट में सँवारे
गुट में सँवारे
खेल को उनके
मान लिया सच
बाटा जाना
था सबको
समझ ना पाए
मेरे भोले
उलझ गए
मेरे तारे
माँ पुकारे
गुड़ पानी से
सेहत जीवन
बानी उनकी
मीठी वीर
गुड से पानी
विलग कराए
ज़हर बुझे
बोलों के तीर
मेरे बच्चों
साथ चले तुम
विलग हो गए
हो अधीर
छटपटाऊँ
नीर बहाऊँ
हाथ पडी
बेड़ी ज़ंजीर
माँ पुकारे
हाथ की मुट्ठी
पाँच अँगुलियाँ
सब में भेद तो
होगा ही
मेरे लालों
हाथ मिलालो
माँ की हालत
है गंभीर
माँ पुकारे
छोटी छोटी
बातों पर तुम
बच्चे हो
तुम लडते हो
खेल खतम हो
जाने पर ज्यों
हिलमिल घर को
चलते हो
माँ पुकारे
आज समझ लो
लाठी मारे
नीर विलग ना
होता है
फिर क्यों
डेरे डेरे डाले
खेमें खेमें
बाँटे हैं
माँ पुकारे ....
छोडो तज दो
ज़ालिम का घर
मीठी छूरी
त्याग दो अब
ढूढों अपने
घर की राहें
चरखे की
आवाज़ से सब
माँ पुकारे
मानवता की
राहों पर ही
मिलते हैं
खुशियों के घर
मिलते हैं
खुशियों के घर
माँ पुकारे
......*अँब्रोस चेट्टियार*
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