रंग कहते हैं
रंग कहते हैं
नमस्कार, मै रंगारंग रंग हूँ ...
आज सभी संस्कारवादियों के घरों गलियों में
चल रहे सभ्यतापूर्ण ? पोतापोती का खेल देखना
हमसे संभव न हुआ
अपनी शर्म से हुई काली आँखे मूंद ली हमने
सुर्ख लाल चेहरा भी काला पड गया
काटो तो खून नही लाल रंगभरे हाथों से
काले कलूटे हो चुके कान भी बंद करने चाहे
कानों को विश्वास नही हुआ
रिश्तों की मर्यादा की मशाल लेकर स्त्री के
घूँघट संभालते हुए चलने पर गर्व जताने वाले
सभी मिल एक दुजे की मर्यादाएँ लांघ रहे थे
उन्हे किसी रिवाज़ का चोला पहना रहे थे
वहीं खडे बच्चे बच्चियाँ असमंजस मे
बडों का मूह ताकते रहे
शायद उनके अभी रिश्ते बने न थे
बनने पर उनपर भी लागू होता यही रिवाज़...
खैर अभी तो बस वे देख रहे थे
कि किस रिश्ते का हक किस पर चलता है
इसी उधेडबुन में उनका खेलखराब होता रहा
बडों को इसकी भनक तक कहाँ थी
सालमें एक दिन मिली इस आज़ादी का
वे आँखेभर कर आनंद लेना चाह रहे थे
कल से फिर उसी घूँघट से धुँधले चेहेरे देखने होंगे......
ये खयाल आते ही झटका सा लगा ,बिजलियाँ सी कौंधी
दिमाग सन्न रह गया .....
इस दर्द का एहसास उन चंद उन्मादपूर्ण लम्हो से काफ़ी गहरा था
मैने तब जाना की यह झूठे और खोखले रिवाज़ बनाने वालों ने
अनजाने में यह गलती कर दी होगी कि उन्होने अपने लिए उपाय करते करते .....
...बस एक दिन ही सही
कुछ हलके फुलके अहसासों के पल
कठोर , झूठी और खोखली मर्यादा की झूठी दीवार को फांद बचपन की ओर लौटते पल वे ज़ालिम संस्कारों एवम खोखली मर्यादाओं के बोझ तले दबी आबादी के अंजुली में
अनायास ही डाल गए ...
.....अब मै शुक्रग़ुज़ार हूँ उनका
इस एक गलत ही सही, मगर सही गलती के लिए .....
मगर फिर भी....
बच्चों को हमें सही राह दिखानी होगी ..
उन्हे इंसान बनाना होगा...
और बनाना होगा लायक ताकि
अपनी समझ से अपने लिए
सही ग़लत का फैसला ले सकें..
.....रुकिए तो पल भरके लिए ...
अंतर्मुख होकर सोचिए
शायद सभी समस्याओं के हल निकलते चले जाएँगे
आज दिनभर आप का सर भारी रहेगा..
फिर भी आज आप सुकून से सो सकते हो ...
मगर याद रहे ....
.....अपने दिमाग़ पर किसी और को हावी मत होने देना...
अपने रंगके अलावा कोई और रग मत सर चढने देना .....
......*अँब्रोस चेट्टियार*
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