कृष्णकुमार कुन्नथ

कृष्णकुमार कुन्नथ

मैं हमेशा सोचता रहता कि वो ऐसा होगा वैसा होगा
मगर कभी टटोल कर देखने की फ़ुरसत ना हुई क्या है कैसा है
सुहाते थे लफ़्ज तुम्हारे और सुर भी घर बसाते थे मनमें गहराई तक
मगर ऐसी बेचैनी और तडप कभी पैदा नही हुई कि पता करूँ कि कौन गुनगुना रहा है ये गीत मेरे ही मनका
इतना क़रीब हो गए थे तुम तुम्हारी साधना गज़ब रही होगी
लोग मजबूर कर देते हैं पलट कर देखने के लिए कि कौन गा रहा है ज़रा देखें तो सही
मगर क़सम से तुम्हारे बारे मे मुझे ऐसा कभी नही लगा
लगता मानो मेरा  दिल ही तो गा रहा है बाहर क्या ढूँढना मै ही तो हूँ
इतना भी कोई तिलिस्म चलाता होगा इसका आज अहसास हुआ
आज टूटा वो जादू का घेरा
न जाने क्यों  रात भर नींद ही नही आई
भोर के पहले पहले पता चला कि हाय ईक तारा टूटा है
अंतिम पल तक जो खनकता रहा लगातार बार बार
और मैने ढूँढा तुम्हारा अक्स पागलों की तरह
और पाया बेबस अपने आप को कि हाय
इस फरिश्ते से अनजान रहा मेै ?
कभी भी मैने पहल नही की जानने की जिसके बारें मे
आज वो भी इतना तडपा सकता है ? 
क्यों नही ?
आखिर इस जहाँ की जरूरत के ही बारे मे तो हमें वो चेताता रहा
अपने प्यार भरे नग़्मो से , ज़हीन अदाक़ारी से पुकारता रहा
यारों कहकर समझाता रहा बहोत याद आयेंगे कल
और तडपते दिलों को संभलने का ग़ुर भी सिखाता रहा
टूटी यारीयाँ जोडता रहा ...
बहोत ही शरीर भी था वो उसकी आँखों मे अजब सी अदाएँ थी जो मैने महसूस की थीं
मगर अफसोस मैने उसे दिलकी आवाज़ समझ कर पलटकर एक बार भी नही देखा
आज पहली बार ज्यूँ उससे मेरा तार्रुफ़ हुआ जा रहा हो
और मै बस उसे ढूँढ रहा हूँ जो पतंग कट चुकी है और बहोत दूर निकल गई है मेरी नज़रों से ओझल
और बोझिल मेरी आँखें मेरी  साँसे
याद करते जा रहे हैं उसका सुहाना सुरीला
अपनत्व भरा सुनहरा सफ़र
.......©अँब्रोस चेट्टियार


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