कान्हा
कान्हा
मुस्काया था
फुल चमन में
गोकुल सारा
झूम उठा
दुष्ट तुम्हारी
नजर जो पडी
आंखों मे अब
नीर भरा
लीला रचवाई
थी तुमने
नाच नचाया
तीनो ठान
हंसी ठिठोली
खूब कराली
नही कराया
बस जलपान
कैसी शिक्षा
बांटी गुरुजन
भयकंपित है
गोकुल धाम
तुम ही मणाओ
अष्टमी नवमी
ज्ञान कराके
सब बदनाम
तुम क्या जाणो
कृष्ण ही जाणे
प्रेम की लीला
क्या होती....
तीथ मनाने
से लौटे हैं
क्या कभी
कोई भगवान ...
©अँब्रोस चेट्टियार
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