वो

 वो

हमारी पोष्टस पर बिन बुलाए
कुछ हिजडे आ जाया करते हैं
अपनी औकात का पूरा चिट्ठा
हमेशा खोल के जाते हैं ..
उन की शान में कुछ लफ्ज
कहना भी वाजिब ना होगा
वो अपनी अहमीयत ना जानते हों
तो हम को ही जताना होगा...

वो

वो दूसरों की बुराई दिखाते थकते नही
मगर वे इतने मसरूफ हैं
इस चाललबाजी और जालसाजी में
के यहाँ तक होश नही उनको के वे बहोश हैं
जानते नही कि उनके आक़ाओ ने
उन्हे भौंकने तो भेज दिया मगर
उनके पाजामे उतार लिये हैं
इतने बेहोश हैं वो
इतने बेहोश हैं वो
औरोंके रंग देखते है
औरों के कपडे देखते हैं..
बस उनका सिर अपनी गिरहबान नही देख सकता
क्योंकि उनकी रीढ की हड्डी निकाली जा चुकी है ...
और उसमे एक डंडा पेल दिया है पिछवाडे से पूरे सर तक
बस झुक नही सकते और अपना नंगा पन नही देख सकते
मगर कभी कभार वो आपस के लोगों पर हँस देते हैं
जब वो उनका नंगापन देख लेते है..
मगर मजाल है डंडा उन्हे फिर भी  झुकने दे अपना अक्स देखने दे और जिन्होने द़ेख लिया अपना नंगापन और रहे अगर वो ग़ैरतमंद फिर नही मिला सके वो आँख किसी से
और  फिर देखने दिखाने लायक न रहे
अपना ज़मीर ही उन्हे गवारा नही कर सका
कि फिर लौट कर उस गंद मे आ ही सके .....
हम उनको समझाते है
उस गर्त से उन्हे निकालते है
उनसे किस बात का बैर हमे
वो हम से बैर क्यों पालते है
वो नासमझ की दुश्शाला ओढे अमूमन आते हैं
बस अपनी रटाई बातों को दोहराये वो जाते हैं
उनको न सुनना हम सब का
इस बात का ध्यान वो रखते हैं
हम अपनी उनकी जान समझ
ये कदम कदम पर कहते हैं
तुम अपने ही तो भाई हो
वो हमें कसाई कहते हैं
खैर हमे किसीसे बैर नही
ना हमे किसीसे डर ही है
हम सच्ची राह पे चलते हैं
और सच्ची बात को कहते हैं
अब फिर से जमाना जागेगा
वो कब तक झूट को पालेंगे
क्या दुनिया का कब्जा करने
वो दुनिया ही मिटायेंगे.... ?
©अँब्रोस चेट्टियार

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