आजादी का चरखा
आजादी का चरखा
याद रहे आजादी के आंदोलन में चरखा भी था मगर वो लोग नही थे जिनको चरखे से आज ऐतराज है
जोश में गले फाड कर चिल्लाकर लोगों में जहर भरने वाले क्या जाने कि दुनियापर जिसका राज था उस कॉटन और सिल्क को मात देने के लिए जब मशिनोंद्वारा निकले मिलावटी धागे और उसके कपडे बनाकर बेचने वालों का भट्टा बैठाने वाले भारतीय कपास एवम सूत एवम खादी का जब घर घर चलन शुरू हुआ तब अंग्रेजी कपडों की दुनिया तबाह हो गई थी और समझिए कि राज छीनने वाले, सत्ता को अपनी बटिक बनाने वाले जनता के उत्थान हेतू नही तो उस देश की जनता की खून की प्यासी होकर भी उसकी क्रयशक्ती की मोहताज होती है बस ..
..... बस उस बूढे वहीं वार किया और चरखा चलाया तो समझने वाला समझ गया और ज्यादा उलझने में कोई तर्क नही वर्ना यह बूढा सारे ब्रितानियों को ही कही अपना शिष्य न बनाले... सारी दुनिया से क्रमश: अपनी सत्ता को स्वयम समाप्त करने पर बाध्य हुए वो, जिनके साम्राज्य पर कभी सूरज नही ढलता था ..समझो इस बात की गहराई को कि अनंत कारणों मे प्रमुख कारण बने भारतिय स्वतत्रता संग्राम युद्ध वर्ना साम्राज्यके विरोध में तो कोई नही लडा था बसअपना अपना सब देख रहे थे यही फ्रक किया भारत ने इस युद्ध ही को मानवता का स्वतंत्रता युद्ध बना लिया .. सोचिए वर्ना जगनमान्य नही हो पाते भारत के विचार तो उन्हे कुचलने मे उस महासत्ता को कितना समय लगता? उसी डर के मारे तो आज के गांधी नेहरू विरोधी तब अंग्रेजों के पल्लू के पीछे जा दुूबके थे तो इन हिजडों चिल्लाने वालो को क्या यह नही पता ? इन्ही के लोगों ने शहीद भगत सिंगजी को फांसी दिलवाने के लिए वकिल बन केस लडे थे| और गांधी नेहरू के देश जनता को बचाने वाले कार्य थे जिनका उन्होने कभी ढिंढोरा नही पीटा ..ना ही कभी किसी को बुरा भला ही कहा... फिर इनको ही गांधी नेहरू को गालियाँ बकने की क्या जरूरत आन पडती है ??? प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नही होती| सब कुछ असली इतिहास में दर्ज है | और इन की बहकाती किताबें कभी किसी ऐतिहासिक मूल्य के लेखक ने नही लिखी सभी भगोडे और तलुए चाटने वाले ये हमे सिखाएँगे देशभक्ती ? क्या ये जानते समझते है . कपास सूत और खादी रटचरखे के मायन देश के लिए क्या होते हैं ? या सिर्फ लूट खसोट उल्लू बनाना स्वार्थ सुरक्षा के आगे भी इन्हे कुछ दिखाई देता है ?
.......गाँधी नेहरू कभी झूट नही बोलते इतिहास गवाह है तुम क्या क्या मिटाओगे ? जनता सच जानती है और सच्चोंको मानती है क्योंकी गांधी नेहरू वो घुट्टी हैं जो सबके आँखे खोलते है और इनको लोगो को अँधेरे मे रख राज करने की राक्षसी महत्वाकांक्षा है जिसको समझने वाले और पुरजोर तरीके से छिन्नभिन्न करने वाले आधुनिक शिवाजी हैं गांधी और नेहरू सर्वधर्म समभाव एवम समता बंधुत्व तथा स्वतंत्रता से जीने की , मानवता की राह को मजबूत बनाने की कोशिश कररने वाले लोग तो क्रूरक्रमाओं को अखरेंगे ही ना ... मतलब साफ है ... देशभक्तों की स्वतंत्रता संग्राम की आहूतियाँ देश को स्वतंत्र करती हैं, जनता की एकजुट
देश को स्वतंत्र करती हैं, बलिदान देश को स्वतंत्र करता हैं और हाँ हाँ गर्व से कहना सीखो कि चरखा भी देश को स्वतंत्र करता है .. एक याद रहे कि चरखा हमेशा प्रेरणा देता है, कर्मरत रहने का और वही से शुरू होती है आत्मनिर्भरता की | शुचितापूर्ण जीवन की नींव है आत्मनिर्भरता और इसी बात को गाँधीजी ने तब सीखा और अमल में लाए जब दुनियाँ पर लाचारी भरे गुलामी के बादल छाए थे | गाँधी नेहरू और सभी सच्चे देशभक्त साथियों ने शुरू की अपने सार्वभौम स्वयम नियंत्रण की , आत्मनिर्भरता की |जिसकी पक्की नींव पडी चरखे के चक्र से और सारा चित्र ही बदल गया, वह भी वैश्विक पटल पर | बस यहीं से औद्योगिक क्रांति के उद्गाता होने के बावजूद राक्षसी महत्वाकांक्षा से सने पश्चिमी बलाढ्य साम्राज्यवादी देशो को, जागृत होते विश्वजन खासकर भारतीय जनता के आगे हथियार डालने ही पडे | वह भारत ही था जिसने शांति का पाठ दुनिया को पढाया | और पढाया हि नही बल्कि यह भी मजबूती से सिखाया कि शांति के साथ भी सुख समृद्धि प्राप्त की जा सकती है | बल्कि सम्मान भी प्राप्त किया जा सकता है | अन्यथा आज चीन जैसे देशों का का अपना फेसबुक अपना वा़ॉटसप अपना अमेजॉन क्यों है ? ये उनका अपना चरखा ही तो है ...बस इन मानवतावादी विचारो का संसर्गपूर्णअसर सारी दुनिया मे भयंकर जहर से भी तेजी से फैला और साम्राज्य वादी देशो की जडे हिल गईं |
मगर मूर्ख चमचागिरी पर आमादा भाडे के टट्टुओं को कौन समझाए कि वह किस दलदल में फँसाये रहे है जब उनके सच्चाई का अहसास होगा तब तक बडी देर हो चुकी होगी | बहुतो को अहसास हुआ भी होगा मगर देर हो चुकी होगी | पक्का याद रहे आजादी के आंदोलन में चरखा भी था मगर वो नही थे जिनको चरखे से आज ऐतराज है |
©अँब्रोस चेट्टियार
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