आग़ाज़ बनो
आग़ाज़ बनो
इक साथ रहो आवाज़ बनो
तुम बदलो जग आग़ाज़ बनो
तुम अपनी बेडी तोड़ दो अब
जंज़ीरें सबकी खोल दो अब
क्या जाने किसकी मायुसी
भरे चेहरे की लालिम हो
नजरों को बिछाये सदियों से
बैठे उनकी परवाज बनो
है तुम बिन उनका जागना भी
और जीना भी है अधूरा सा
तुमसंग ही वो तय करते है
तुम उनका सुखद सफर बनो
रहे याद मगर अबसे आगे
के शमा जलाए रखनी है
अँधियारे से नही समझौता
पथ रौशन करता दीप बनो
©अँब्रोस चेट्टियार
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