हुंकार

 


हुंकार

आसन त्याग कर सत्य उठ खडा हुआ
भरी सभा के दैदिप्यमान चेहरे को देखा
फिर आँखों से विशाल जनसागर को देखा
लहरों की हुंकार टटोलकर उनपर सवार हो गया
बडे ही संयत भद्र वाणि से सभी का संबोधन किया
फिर प्रत्यंचा कसकर बाण चढाकर साधा लक्ष्य पर ध्यान
क्षणमें तनी हुई दूरस्थ भृकुटियों के सम्मुख बींध चला लक्ष्य को
तिलमिलाते हुए महलों से मशालें निकलीं घमासान छिडा रहा
लहरों की हुंकारे भी दहाडती सी कौंधती हुई प्रलय मचाने लगीं, नतीजा
मशाले सिर्फ बुझी ही नहीं, सारी तिलमिलाहट भरे घमासान को भी ले डूबीं |
   ©अँब्रोस चेट्टियार

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