आज तुम्हारी बरसी पर

आज तुम्हारी बरसी पर

ये दिन बडा भारी है मुझपर
फिर याद तुम्हारी ले आया
दूर ही सही पर अहसास तो था
हम पर था तुम्हारा साया |

पर निष्ठूर समय का चक्र चला
सब कुछ तीतर बीतर पल में
तुमसे बिछडना भी बदा था
अडिग अटल थे विचारों में |

हमने जब भी देखा, देखा
लंबी रेखा खिंची हुई
हमको थी गौरवान्वित करती
रौशन होती रही, हुई |

तुम हमारे लिए थे अद्भुत
नाम तुम्हारा साँसों मे
दूर भले ही रहे हों जग में
ख़ैरियत की सदा दुआओं में |

हमने भरसक कोशिश की पर
पहुँच सके ना तुम तक हम
तुमने भी क्या की थी चेष्ठा,
हमतक पहुँचने लिये थे श्रम ?

रह गई दिलमें हसरत दिलकी
दूर करादें गिले शिक़वे
दिल की ग़र हम सुन पाते तो
नही उपजते ये फाँसले |

बसमें किसिके कोई थे नही
अहम बडा हो चला था तब
कुछ समझदारी की कमी थी
कोशिशें किसीने की हीं कब ?

चाहा सुनना तुमसे अच्छा कुछ
हरदम ये मन करता था
आज तुम्हारी बरसी पर मगर
आकुल व्याकुल हो उठा |
    ©अँब्रोस चेट्टियार


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