यात्रा


यात्रा

साधारण जन गण की
बात करें
पुरुषार्थ वाली
बात करें
ये यात्रा है तुम, हम सबकी
हर कोई कहीं
शुरुआत करें
समर्थन न देना चाहे अगर
कोई बात नही सम्मान करें
चाहे अलग हों पथ भी कहीं
जनकल्याण का आग़ाज़ करें |

जनता नही रूकती कभी
उसके हाथ पर उसका पेट जो है
वो मेहनत करती जाती है
वो धरती पर ही खटती है
वहीं पर सिर झुकाती है |

ओर कभी तुम उनसे मिलो
बाहें फैलाए मिलते हैं 
पीठ सीधी उनकी होती है
वो सबको गले लगाते हैं
फिर भी जनता कहलाते हैं |

सिर झुका हुआ न पाओगे
आँखोंसे आँख मिलाओगे
गर तुममे होगी गैरत तो
उस आँख में देख पाओगे |

आज देख रहा है जग सारा
तू देख रहा जनता को जब
यह तेरी तपस्या का फल है
जो देख समझ सब पाता है |

जनता को आस अब तुझसे है
ज्यूँ कटुता तेरे पास नही
हम सब की दुलारी धरती माँ
बेटे भी किसीके दास नही |

चुप रहना सहना डर नही
वो अंतर (अंतरमन) को दिखाता है
पानी गहरा सर डूबे तो
उसे तैर तारना आता है |

बन किसान फ़सल उगाता है
वो पालता पेट और जग सारा
करे बंजर खेत को उपजाऊ
चुन, पीट, पाट कंकड सारा |

ना उसको हलके मे लेना
हे सत्तालोलुप गीदड तुम
जब अन्नदाता ही नही रहा
तुम्हे सोचो कौन खिलाएगा |

ये साधारण से लोग मजदूर
वही धरा के मालिक हैं
उनसे घमंड नही अच्छा
सेवा मे हों रत अच्छा है |

क्या लाया, क्या ले जाना है
बस सेवा ही तो करनी है
माँ नौ महिने का गर्भ सहे
कमाई चरणों में धरनी है |

मै,तू, तुम, आप, हम, सब एक
ये जीवन अनमोल पाते हैं
फिर कहाँ से आती है दीवारें
ये कौन भेद विष बोते हैं |

अब आँखें रखें खुली खुली
और कदम हमेशा सही पडें
किसी भेद छलावे मे आकर
अब फिर से ना कोई फूट पडे |
      ©अँब्रोस चेट्टियार

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