मुबारक हो !
आप सौ सालके हैं बहोत बहोत मुबारक हो..
आप सौ सलके हैं..
और आप अपनी अलग सोच रखते हैं ? बहोत खूब !
क्या कहा ?
आप स्वतंत्रता संग्राम मे गाँधी जी की पुकार पर कूद पडे थे ?
मगर फिर भी गाँधी और नेहरू के विचार को पूरी तरह नही स्वीकारते ?
ऐसी कौनसी कमी थी उनके विचारों में, जो आपको खटकती थी या खटकती है ?
क्या ? बहोत सारी ?
जैसे ? क्या आपने गांधी को पढा है ?
नहीं ?
कमाल हैं ! ...
आप उनके काल मे रहे हैं फिर भी ? उनके साथ स्वतंत्रता संग्राम मे लडे हैं . फिर भी ? सारी दुनिया उनकी कायल हैं फिर भी ?
फिर आज के कुछ जवान जो उनके बरे मे कु छ जान ते भी नही तब भी सूनी सूनाई बतो पर जाकर बुरा भाला कहते हैं.. ऐसे मे उनको कौन सही मार्ग दिखाये? आप से उम्मीद तो हैं मगर आप स्वयं ही ... खैर ..
जहाँ तक मैने समझा है
बापू का कोई तोड नाही है l
उनकी हर बात के पीछे गहरी सोच हैं l
उनकी सोच, उनका विचार, उनकी भक्ती, उंका भाषण, उनका लेखन, उनका प्रवचन, उनका त्याग, उनका समर्पण, उनकी दृढता, उनके शब्द, उनके दृष्टी, उनका चयन, उनका कार्य, उनकी चाल...... अनंत की ओर बढते उनके कदम, उनकी क़लम, उनकी प्रतिबद्धता और उनकी मासूमियत से ओतप्रोत जगन्मोहिनी मुस्कान..
मै रुक नही पाता मै थकता नही उनके बारे मे कहते हुए ...
एक शब्द मे कहूँ तो मेरे बापू ...
उन्हे देखा भी नही मगर महसूस करता हूँ ..
आश्चर्य है आप तो उनके दौर के होकर भी..
खैर
एक बात तो सही है कि
बापू समय से बहोत आगे देखते हैं वे सब देखते हैं
और उन्हे भी थोडा बहोत दिखता है, जिन्हे बापू दिखते हैं ...
मुझे तो सिर्फ बापू दिखते हैं ..
दाएँ बाएँ देखकर ही तो उन्होंने यह रह चुनी होगी
मुझे तो उन्ही की सर्व समावेशक राह सही लगती हैं..
ऐसेही नहीं सारी दुनिया उनको प्रणाम करती
ऐसेही नही सरी दुनिया उनको मानती...
आप सौ साल से भी उपर के हैं तो लोग आप से प्रभावित है मगर आप उनसे प्रभावित नही ? आश्चर्य है ...
इसे बडा आश्चर्य यह हैं ..की जीस राह को त्याग कर बापू और नेहरू आहे बढे आप फिर उसी राह पर तैनात है...
हाल ही मे किसी बुजुर्ग ने सही कहा था .. वो लोग ढंग से जीना नाही जानते ... बस कितना सटीक खा था...
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