कंबख़्त मजबूरी
कंबख़्त मजबूरी
मुझे क्या ज़रूरत
कि मैं सोचूँ तुम्हारे बारे में,
मै तो अपनों के बारे में भी
कम ही सोच पाता हूँ,
मुझे क्या ज़रूरत
कि मैं सोचूँ तुम्हारे बारे में,
मै तो अपनों के बारे में भी
कम ही सोच पाता हूँ,
मगर कंबख्त
अपनों के अपने,
कुछ ज्यादा ही सोचने पर
मजबूर कर देते हैं,
वर्ना
मुझे क्या जरूरत
कि मैं सोचूँ तुम्हारे बारे में |
तुम्हारा सीधे सीधे
मुझसे कोई रिश्ता तो
बनता नही,
कि मै सोचूँ तुम्हारे बारे में ..
और कोई झंडा भी तो
नही दिखाई पडता
जो तुमने कहीं गाडा हो,
या तुम्हारा नाम भी कोई
सुना सुनाया सा लगता नही l
हाँ बस मेरे दिल के
टुकडों से तुम जुडे हो
सो विशेष बन जाते हो
कुछ ज्यादा ही सोचने पर
मजबूर कर देते हैं,
वर्ना
मुझे क्या जरूरत
कि मैं सोचूँ तुम्हारे बारे में
कि मैं सोचूँ तुम्हारे बारे में |
*अँब्रोस चेट्टियार*
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