सतपथ

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चल सतपथ सतपथ सतपथ
तज अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

विकार को तू त्याग दे
धरा के साथ आ ज़रा
के फूल पर्ण तितलियाँ
खिलखिलाके गा तो लें

अभी न हो कोई हिचक
अभी न हो कोई थकन
के मुस्कराहटों की राह
दीप कुछ जगा तो लें

तेरा नहीं जला जो दीप
क्या हुआ प्रयत्न कर
किसी के यत्न ही से तो
यहाँ तलक तू आ सका

तुझे यहाँ मिला जो कुछ
किसी की बीती जिंदगी
के आँधियों के बीच भी
कोई दिया जला गया

तू शुक्र कर अभी तलक
के सांस ले रहा है तू
किसी ने फुल पालकर
किसी ने पेड बो दिए

मगर अरे जरा पलट
तू देख क्या है कर रहा
के जल हवा ध्वनी सभी
बिगाडता ही जा रहा

अभी संभल अभी तू मुड
के वक्त है नहीं बचा
तू आग बोते जायेगा
क्या शीतलता पाएगा

तू खेलकूद मे मगन
हो रंजन कर पा भी ले
मगर धरा की सोचके
जरूर फूल बो भी ले

हिंसा की राह तज
भूतदया जान ले
मारकर न हीन बन
बचा के जीव बन बडा

संभल गया जो जीव है
किसिके काम आ गया
किसी की राह प्रेम का
जो दीप हो जला गया

जो दीप से है रोशनी
समझ गया जगा गया
नही समझ सका कोई
तो नास ही मचा गया

त्रिदोष जल, ध्वनी, हवा
के पार भी तो नास ये
पहुंच के मुख पसार के 
तेरे भी पुत्र खाएगा

अभी भी कुछ बचा सके
तो बांध के कमर निकल
निकल रहा समय तेरा
बचा ले सब रहा फिसल

कठिन रहेगी राह अब 
विराम का समय नहीं
कदम कदम बढा निकल
है कीमती तेरी पहल

   *अँब्रोस चेट्टियार*

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