इश्क़
इश्क़
मैं तुम्हारी निगाहों को पढ़ता रहा
सुबह से शाम कैसे हुई क्या पता
जब दिखाई पडी इक शमा नज़्र में
तब कहीं जाके ये इश्क़ *रौशन हुआ
और झुकी आँख से तुमसे लेते विदा
नम थीं चश्में हमारी कहें तुमसे क्या
बस यही हाल होता है जब हों यहाँ
और वहाँ वत्न की बस हिफ़ाज़त जहाँ...
.......
यूँही परवान चढ़ता है इश्क़ मेरा
खिल रहा अम्ने वतनों का गुलशन भरा
अब से यादों ख़यालों में तौरों मे भी
फर्ज़ों तरजीहे शामिल हों आगे सदा
अब ना ग़ाफिल तू रहना ओ मनवा मेरे
वत्नो अम्नीश्क़ का परचम फहरा रहे
*अँब्रोस चेट्टियार*
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