राजा
(मूळ रचनाकार आदरणीय कविश्रेष्ठ मंगेश पाडगावकर, बोलगाणी, १९९०)
राजा
भरी सभा में बोलता राजा बरबस ही रो पडता था
प्रजाजन की चिंता में पलक झपकते डूबता था
राजा बडा अभिनेता था, राजा था शिकारी,
इतना वैभव होते हुए भी राजा था भिखारी !
कई मूर्ख बंदरोंकी टोपियाँ उसने ली थीं
और जिनको पहनानी थीं टोपियाँ पहनादी थीं !
जहाँ रखता हाथ वहीं जी भरके पकवान डकार जाता
चाहे जैसा राजा वही पत्रकार भी छपवा देता !
भिखारी क्यों था ? राजा को ही पता था !
(वैसे उसका मन कहते हैं भीतर से बहोत भावुक था !)
राजा रोज मुकुट पहनकर आईना निहारता जाता,
स्वयंपर प्रेम करता अपनी तरफ देखता जाता !
प्रजा सारी मुठ्ठी में थी, जयजयकार करती
खोखले वादे खाते खाते अपना पेट भरती
सभी गुंडों दबंगोंपर भीतरसे जमाए ताबा थे
उसका भविष्य बताने हेतु एक बडे बाबा थे
बडे बाबा के बाद उसकी खुदपर भक्ती थी
खुदपर प्रेम करना यही उसकी शक्ती थी
राजाका यशगान स्तुती के छंद सारे याद थे
राजाकी सेवामे तत्पर ऐसे ऐसे भाट थे
(भाषांतर धारिष्ट्य अँब्रोस चेट्टियार)
राजा (मंगेश पाडगावकर, बोलगाणी, १९९०)
एक प्रयत्न ....
अगदीच राहवले नाही ही रचना पाहून म्हणून हा प्रपंच...
भावना समजून घ्याल ही अपेक्षा .. मूळ रचनेचा वा अर्थ , भावाचा कोणताही उपमर्द करण्याचा अजिबात हेतू नाही ही प्रांजळ कबुली देऊन मराठमोळा राजा हिंदीतून सादर केला ..
राजा
(मूळ रचनाकार आदरणीय कविश्रेष्ठ मंगेश पाडगावकर, बोलगाणी, १९९०)
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