फलसफा

वो तो अपने आपको छोटी मोटी
परेशानियोँ  में उलझाकर रखता है, रहने दो ना
वरना फुरसत पाते ही वो
गहरी यादोँ मे डूबने लग जाता है, खो जाता है

परेशानियाँ, वो यादेँ जिनसे वो अपने आपको
कभी अलग कर नही पाया
जो उसके दिलो दिमाग में,
रगों मे बहते लहू की तरह बहती रहतीं  हैँ

ये कोई नई बात तो नही
हर किसी शख्स की यही कहानी सी है
मगर कोई अपनी तो भूल पाता नही
चाहता है दूजा बस नाचता रहे हमारे साथ मौज करे,
कुछ याद ना करे

जिस मिट्टी के बने हैं लोग यहाँ
कोई उसको झुटलाना भी चाहे तो कैसे करे ?
कोई क्योंकर अपनी बातोँ को भूले, बीती को भूले ?
और जीते जी मर जाए, बस हँसता ही रहे

ये तो मुमकिन ही नहीं ऐ ज़माने तेरी हो लाख सजा
वो तो हँसता भी रहेगा या मरेगा
और करेगा अपनी यादोँ को ताजा
हैं हजारों ही सही ख़ामियाँ है हममें, सबमें

ऐसे दुनियाँ में कोई शख्स पाक़ साफ़ ना होगा
आपसे उम्मीद होगी मगर फिर भी
लौ तो जलती है कई बार बुझबुझ के ऐ हवा
जब तलक राख में खुद को तब्दील ना कर ले

उसके जीने का फलसफा उसका अपना ही होगा
क्या कोई जी सका है औरों का जीवन सर उठाकर
वो तो अपने आपको छोटी मोटी
परेशानियोँ  में उलझाकर रखता है, रहने दो ना
      *©अँब्रोस चेट्टियार*

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