दुर्गम 


वो समाधी लगाते थे 


कैसे


अपनेआप को भीतर से 


पाते थे कैसे  ?


बडी दुर्गम ये राह है


क्या पता वे लोग 


अपनी मंजिल को 


पाते थे कैसे  ?


सिसकियांन तो 


खैर ! 


बिलकुल मामुली सी बात है 


यहाँ तो हर कदम पर 


दम ही निकल जाता है


क्या पता 


वे फिर भी मुस्कुराते थे कैसे  ? 


अपने भीतर के सैलाब से 


निबटते थे कैसे ?


अपने आपको फिर काबू मे 


रख पाते थे कैसे ?


हाय ! टूट के बिखर जानाही 


जिनकी किस्मत बन चुकी हो 


आखिर औरों को राह दिखाने मे 


जुट जाते थे कैसे  ? 


ये तो और भी कडी सजा हो ज्यूं


नंगे पांव मीलो रेगिस्तान की 


तपती रेत को नापते चले जाना जैसे... 


...और उफ तक नही....


हम से एक कदम भी 


चला जाता नही. 


कैसे ये लंबा वीरान सफर तय होगा.....  


यही सवाल रह रह कर 


कौंधता रहता है 


झंझोड कर रख देता है 


और सहमा सा छोड कर 


पल आगे को बढ जाता है...    


फिर बिखरे से 


और बिखरते चले जाते 


महसूस करते रह जाते हैं...



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