जरूरी नही कि वो सही हो 

जरूरी नही कि वो गलत हो

जरूरी ये है कि 

जिसपर आप चल सकें 

ऐसा कोई तो रास्ता हो...

चल दो, चल भी दो मंजिल मिलेगी

सही गलत का फैसला होता रहेगा

सही हो तो चलते रहना

गलत हो तो बदल भी लेना..     

कई ऐसे भी फंसे है

ना रास्ता है ना मंजिल 

चारो तरफ बस घुप्प अंधेरा और रोशनी का आता पता नही..

ना सूरज उगता है ना दिन ही ढलता है

ना चांद निकलता है ना रात ही गुजरती है..


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